Tuesday, February 17, 2026

18 दिसंबर 1954 की बात है… आजादी के बाद की पहली लोकसभा में विपक्ष स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव लाया था। उस समय कांग्रेस के पास 489 में से 364 सीटें थीं। इतनी ताक़त, जितनी आज बीजेपी सोच भी नहीं सकती। फिर भी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सत्ता का घमंड नहीं दिखाया। बहस शुरू हुई। डिप्टी स्पीकर ने बताया कि चर्चा के लिए दो घंटे तय हैं। तभी नेहरू जी खड़े हुए और डिप्टी स्पीकर से निवेदन करते हुए बोले… ‘महोदय, इस बहस में विपक्ष को सरकार से ज़्यादा समय मिलना चाहिए। हम कम बोलेंगे, लेकिन विपक्ष को खुलकर बोलने दीजिए।’ सोचिए, इतनी ताकत होने के बावजूद नेहरू जी ने विपक्ष की आवाज़ को और बुलंद करने का आग्रह किया। क्योंकि उन्हें पता था- संसद सिर्फ बहुमत की नहीं, बल्कि विपक्ष की भी जगह है. और अब ज़रा आज की मोदी सरकार को देख लीजिए. प्रधानमंत्री मोदी को देखिए- नेता विपक्ष राहुल गांधी को बोलने ही नहीं दिया जा रहा है. कभी उनका माइक बंद किया जाता है तो कभी उनकी आवाज़ को दबा दिया जाता है. मोदी के इशारों पर पूरी सरकार विपक्ष की आवाज को कुचल रही है. विपक्षी सांसदों को सस्पेंड किया जा रहा है- सदन ठप कर दिया जाता है. यही फर्क है कांग्रेस सरकार और भाजपा सरकार में. पहली लोकसभा में विपक्ष में कोई बड़ा चेहरा नहीं था, फिर भी उसे पूरा सम्मान मिला। आज विपक्ष को चुना हुआ जनादेश मिला है, फिर भी उसकी आवाज़ दबाई जा रही है। ये फर्क सिर्फ सत्ता का नहीं, संस्कार का है। नेहरू जी ने संसद को बैठकर, बोलकर, सुनकर और सहमति-असहमति से गढ़ा। आज वही संसद एक कमजोर परछाईं बनती जा रही है, जहां सिर्फ सरकार बोलती है और बाकी सबको चुप करा दिया जाता है। यही असली फर्क है कांग्रेस के लोकतंत्र और बीजेपी के अहंकार में www.navjivanfoundation.org


 

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